वृषभ लग्न की संपूर्ण जानकारी

वृषभ लग्न की संपूर्ण जानकारी

वृषभ लग्न के जातको के गुण

वृषभ राशि एक भौतिक या स्थिर राशि है, जिसका स्वामी शुक्र है। इस लगन में जन्मे जातक सद्गुणी, दृढ़ निश्चयी, साहसी और वीर होंगे, लेकिन साथ ही आप घमण्डी, हठी, कठोर भी हो सकते हैं। ऐसे व्यक्ति मेहनती, स्थिर विचार वाले, स्वभाव से सज्जन, धीर किन्तु शान्त प्रवृत्ति वाले, स्वार्थी, काम सम्बन्ध में रूचि रखने वाले, अपनी इच्छानुसार कार्य करने वाले, दूसरों से ईर्ष्या रखने वाले, तीव्र स्मरण शक्ति से युक्त, काव्य के प्रति रूचि रखने वाले, चतुर नीतिज्ञ एवं सम्बन्धियों एवं मित्रों की सहायता से धन अर्जित करने वाले होते हैं।

आप अपने कार्य और लक्ष्य से भलीभांति परिचित होंगे एवं उसे दक्षता और निपुणता के साथ पूर्ण करेंगे। आन्तरिक रूप से आप खुशी ढूढ़ने वाले एवं विषय सुख का भोग करने वाले हो सकते हैं। आपको सुन्दर परिधानों और आभूषणों को पहनने का शौक होगा। अपने निजी जीवन में आप खिन्न स्वभाव वाले हो सकते हैं एवं नये लोगों पर जल्द विश्वास नहीं करेंगे। आप बुद्धिमान तथा चतुर होंगे और आप व्यवसाय या व्यापार के ममलों को बखूबी समझेंगे। आपका न थकने वाला दिमाग आपको ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करेगा, जो आपके प्रतिद्वंदी की पहुंच में नहीं होगा। आपमें कुछ ऐसे शौक हो सकते हैं, जो बाद में आपका मुख्य व्यवसाय बन जायेंगे।

वृषभ लग्न में जन्मे जातक आभूषण, सुगन्धित पदार्थ, संगीत कला, भवन निर्माण, बैंकिंग, विज्ञापन अथवा प्रचार व्यवसाय में अधिक सफलता प्राप्त करते हैं। कन्या अथवा वृश्चिक लग्न वाले जातकों के साथ यदि ये साझीदारी में व्यापार करें तो सफलता प्राप्त होती है। ऐसे जातक कभी खाली नहीं बैठ सकते। ये किसी न किसी रूप में स्वमं को व्यस्त रखते हैं एवं निरन्तर कोई न कोई योजना बनाकर उसे शीघ्र अमलीजामा पहनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं।

वृषभ लग्न में ग्रहों के प्रभाव

वृषभ लग्न में चंद्र ग्रह का प्रभाव

वृषभ लग्न की कुंडली में मन का कारक ग्रह चंद्रमा तृतीय भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास इत्यादि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए वृषभ लग्न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले ये सभी कार्य ही होते है। जन्‍मकुंडली एवम दशाकाल में चंद्र के शुभ रहने पर उपरोक्त वर्णित संदर्भों में जातक को शुभ फ़ल मिलकर वृषभ लग्न के जातक का मन प्रसन्न रहता है। यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में चंद्र के कमजोर अथवा पाप प्रभाव में रहने पर उपरोक्त संदर्भों में अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं और जातक को मानसिक क्लेश की प्राप्ति होती है।

वृषभ लग्न में सूर्य ग्रह का प्रभाव

प्रकाश पुंज सूर्य वृषभ लग्न में चतुर्थ भाव का स्‍वामी हो कर यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है। जातक अपने नाम यश और कीर्ति के लिये चतुर्थ भाव के संदर्भों का उपयोग करता हैं। वृषभ लग्न के जातकों का अपने नाम यश, कीर्ति प्रसिद्धि के लिए इनका सर्वाधिक ध्‍यान उपरोक्त वर्णित संदर्भों में लगा होता है। जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के शुभ और बलवान रहने से जातक की कीर्ति यश फ़ैलकर बडे शुभकारी फ़ल प्राप्त होते हैं और सूर्य के कमजोर और पाप प्रभाव में रहने पर से उपरोक्त वर्णित संदर्भों में कमी से इनकी यश कीर्ति में कमी होती है।

वृषभ लग्न में मंगल ग्रह का प्रभाव

सप्‍तम और द्वादश भाव का स्‍वामी वृषभ लग्न में मंगल होता है। सप्तमेश होने के नाते यह जातक के घर गृहस्‍थी सहित लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार इत्यादि का कारक होता है और द्वादशेश होने के नाते यह खर्च का प्रतिनिधित्‍व करता है। जाहिर है इस लग्न के जातकों के घर गृहस्‍थी (सप्तम भाव) के वातावरण में खर्च (द्वादश भाव) की अहम भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल के बलवान एवम शुभ प्रभाव में रहने पर वृषभ लग्न वाले जातक की खर्च शक्ति की योग्यता बढने से से घर गृहस्‍थी के कार्य कार्यान्वित करने में सुख और सहजता प्राप्त होती है। यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल कमजोर हो अथवा पाप प्रभाव में हो तो जातक की खर्च शक्ति की कमी के कारण घर गृहस्‍थी का वातावरण कष्‍टमय हो जाता है।

वृषभ लग्न में शुक्र ग्रह का प्रभाव

शुक्र प्रथम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है। लग्नेश होने के कारण यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है। तथा षष्ठेष होने के कारण जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी जैसे सभी प्रकार के संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इन दोनों ही भावों का वृषभ लग्न के जातक के स्‍वास्‍थ्‍य और आत्‍म विश्‍वास से अति गहन संबंध होता है। जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में शुक्र के शुभ प्रभाव व बलवान होने पर हर प्रकार से शरीर व स्वास्थ्य का लाभ होता है एवम वर्णित संदर्भों में शुभ फ़ल मिलकर जातक का आत्मविश्वास बढा हुआ होता है। इसके विपरीत जन्‍मकुंडली या दशाकाल में शुक्र के कमजोर या पाप प्रभाव में रहने पर उपरोक्‍त वर्णित विषयों में परेशानी पैदा होकर इनके स्‍वास्‍थ्‍य मे परेशानी एवम आत्‍म विश्‍वास में कमजोरी बनी रहती है।

वृषभ लग्न में बुध ग्रह का प्रभाव

बुध द्वितीय भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के कुल, कुटुंब, विद्या, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है। जन्‍मकुंडली या दशाकाल बुध के शुभ प्रभाव में रहने पर वृषभ लग्न के जातकों को उपरोक्त वर्णित विषयों में सहजता और शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं। जबकि इसके विपरीत बुध कमजोर या पाप प्रभावगत हो तो, उपरोक्त वर्णित संदर्भों में न्यूनता औए कठिनाईयो का सामना करना पडता है।

वृषभ लग्न में बृहस्पति ग्रह का प्रभाव

बृहस्‍पति अष्‍टम भाव का स्‍वामी होकर व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख का प्रतिनिधित्व करता है। जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एव शुभ प्रभाव में रहने पर उपरोक्त वर्णित विषयों में शुभ फ़लों की प्राप्ति होती है इसके विपरीत पाप प्रभाव एवम कमजोर वॄहस्पति के कारण इन फ़लों के विपरीत फ़ल प्राप्त होते हैं।

वृषभ लग्न में शनि ग्रह का प्रभाव

शनि नवम और दशम जैसे दो महत्वपूर्ण भावों का स्‍वामी होता है। यह नवमेश होने के नाते जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है। एवम दशमेश होने के नाते यह राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति जैसे संदर्भों का प्रतिनिधी होता है। ये दोनों ही भाव वृषभ लग्न के जातकों के धार्मिक, राजनैतिक सामाजिक जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। जन्मकुंडली या दशाकाल में शनि के बलवान व शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त वर्णित विषयों एवम मुख्यत भाग्य और कर्म से संबंधित अत्यधिक शुभ व सकारात्मक फ़लों की प्राप्ति होती है इसके विपरीत कमजोर व पाप प्रभाव में होने पर इन विषयों में अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं।

वृषभ लग्न में राहु ग्रह का प्रभाव

राहु पंचम स्थान का स्वामी होकर पंचमेश बनता है और एक अत्यधिक महत्वपूर्ण त्रिकोण का स्वामी बनता है। और जीवन के अति महत्वपूर्ण विषयों जैसे बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार का प्रतिनिधित्व करता है। जन्मकुंडली अथवा अपने दशाकाल में बलवान और शुभ प्रभाव गत राहु उपरोक्त विषयों में अत्यधिक शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत राहु इन विषयों में न्य़ुनता देकर अशुभ फ़ल ही अधिक देता है।

वृषभ लग्न में केतु ग्रह का प्रभाव

केतु एकादश भाव का स्वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि भावों का प्रतिनिधि होता है। जनम्कुंडली मे अथवा अपने दशाकाल में बलवान व शुभ प्रभाव गत राहु अत्यंत शुभ फ़ल देकर सभी तरह से आमदनी बनाये रखता है वहीं कमजोर एवम अशुभ प्रभाव गत केतु उपरोक्त फ़लों में कमी करके अशुभ फ़ल प्रदान करता है।

वृषभ लग्न में ग्रहों की स्तिथि

वृषभ लग्न में कारक ग्रह (शुभ-मित्र ग्रह)

शुक्र देव 1, 6, भाव का स्वामी

बुध देव 2, 5, भाव का स्वामी

शनि देव 9, 10, भाव का स्वामी

वृषभ लग्न में मारक ग्रह (शत्रु ग्रह)

चन्द्र देव 3, भाव का स्वामी

मंगल देव 7, 12, भाव का स्वामी

बृहस्पति देव 8, 11, भाव का स्वामी

वृषभ लग्न में सम ग्रह

सूर्य देव 4, भाव का स्वामी

वृषभ लग्न में ग्रहों का फल

वृषभ लग्न में शुक्र ग्रह का फल

वृषभ लग्न की कुंडली में शुक्र लग्नेश पहले और छठे भाव का स्वामी होने के कारण वह कुंडली का सबसे योग कारक माना जाता है।

तीसरे, पांचवें (नीच राशि), छठे, आठवें और बारहवें भाव में यदि शुक्र देव पड़े हैं तो वह अपने अंश मात्र बलाबल अनुसार अशुभ फल देंगे क्योँकि इन बुरे भावों में होने के कारण वह अपनी योगकारिता खो देते हैं। यहाँ पर शुक्र देव का रत्न धारण नहीं किया जाता है क्यूंकि इन भावों में बैठ कर शुक्र देव एक शत्रु की भांति फल देते हैं, इनकी अशुभता को कम करने के लिए शुक्रदेव के दान व पाठ पूजन किया जाता है।

यदि शुक्र देव अस्त अवस्था में किसी भी भाव में पड़े हों तो उनका रत्न धारण किया जा सकता है और उनसे लाभ लिए जा सकता है !

वृषभ लग्न में बुध ग्रह का फल

वृषभ लग्न की कुंडली में बुध देव दूसरे भाव के स्वामी है तथा पाँचवें भाव के स्वामी हैं। पंचमेश होने के कारण बुध देव इस लग्न कुंडली में योगकारक ग्रह माने जाते हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पाँचवें, सातवें, नौवें और दसवें भाव में यदि बुध देव पड़े हों तो अपने अंशमात्र बलाबल के अनुसार शुभ फल देते हैं।

ग्यारहवें भाव में बुध देव अशुभ हो जातें है क्योँकि यह उनकी नीच राशि है।

इस कुंडली में किसी भाव में बुध देवता यदि सूर्य के साथ अस्त अवस्था में पड़े हों तो उनका रत्न पन्ना पहनकर बुध देवता का बल बढ़ाया जाता है।

बुध देवता यदि तीसरे, छठे, आठवें, बारहवें और बारहवें ग्यारहवें भाव में उदय अवस्था में पड़े हो तो उनका दान करके उनकी अशुभता कम की जाती है।

वृषभ लग्न में शनि ग्रह का फल

वृषभ लग्न की कुंडली में शनि देव नौवें और दसवें भावों के स्वामी होने के कारण अति योग कारक ग्रह हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें दसवें, ग्यारहवें भावों में शनि देव अपनी दशा अन्तरा में अपनी क्षमतानुशार शुभ फल देते हैं।

इस कुंडली में किसी भी भाव में यदि शनि देव सूर्य के साथ अस्त अवस्था में पड़े हैं तो उनका रत्न नीलम पहन कर उनके बल को बढ़ाया जाता है।

यदि शनि देव तीसरे, छठे, आठवें, और बारहवें भाव में उदय अवस्था में पड़े हैं तो उनका रत्न नीलम कभी भी नहीं पहनना चाहिए बल्कि दान और पाठ करके शनि देव की अशुभता दूर की जाती है।

वृषभ लग्न में सूर्य ग्रह का फल

वृषभ लग्न में सूर्य देवता सम ग्रह माने जाते हैं। वह चौथे भाव के स्वामी हैं परन्तु लग्नेश शुक्र के शत्रु हैं।

इस कुंडली में सूर्य देवता अपनी स्थिति और बलाबल के अनुसार अच्छा और बुरा फल देते हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में पड़े सूर्य देवता अपनी दशा अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं।

तीसरे, छठे, आठवें, और बारहवें भाव में सूर्य देव पड़े हैं तो उनका दान और सूर्य को जल चढ़ाकर उनकी अशुभता को दूर किया जाता है। इस अवस्था में सूर्य का रत्न माणिक नहीं पहना जाता है।

वृषभ लग्न में चंद्र ग्रह का फल

चंद्र देवता वृषभ लग्न में मारक ग्रह है। क्योँकि वह तीसरे भाव के स्वामी हैं और लग्नेश शुक्र के विरोधी दल के हैं।

इस कुंडली में चंद्र देवता सभी भावों में अशुभ फल देंगे।

चंद्र देवता के दान करके उनकी अशुभता दूर की जाती है।

इस लग्न कुंडली में मोती कभी नहीं पहना जाता।

वृषभ लग्न में मंगल ग्रह का फल

मंगल देवता वृषभ लग्न की कुंडली में मारक ग्रह हैं। सातवें और बारहवें भावों के स्वामी होने के कारण मंगल देवता लग्नेश शुक्र के विरोधी दल के हैं (अष्ठम से अष्ठम नियम के अनुसार)।

इस लग्न कुंडली में मंगल देवता सभी भावों में अशुभ फल देंगे। परन्तु 6, 8, 12, भावों में यदि मंगल विपरीत राजयोग में हैं और लग्नेश शुक्र बलि और शुभ हैं तो वह शुभ फल देंगे।

मंगल देवता की दशा-अंतर्दशा में उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता कम की जाती है।

इस लुंडली में मंगल का रत्न मूंगा कभी नहीं पहना जाता।

वृषभ लग्न में बृहस्पति ग्रह का फल

बृहस्पति देव इस लग्न कुंडली में एक मारक ग्रह हैं। आठवें और ग्यारहवें भाव के स्वामी होने के साथ – साथ वह लग्नेश शुक्र के विरोधी दल के ग्रह हैं।

बृहस्पति देवता छठे, आठवें और बारहवें भाव में पड़े हैं तो वह शुभ फलदायक भी होते हैं परन्तु इसके लिए शुक्र का बलि और शुभ होना अनिवार्य है।

इस लग्न कुंडली में बृहस्पति देवता सभी भावों में अपनी दशा/अंतर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार अशुभ फल देते हैं।

इस कुंडली में सदा ही बृहस्पति देवता के दान किये जाते हैं। उनका रत्न पुखराज इस कुंडली में कभी भी नहीं पहनना चाहिए।

वृषभ लग्न में राहु ग्रह का फल

राहु देवता की अपनी राशि नहीं होती है। मित्र राशि और शुभ भाव में बैठ कर वह शुभ फल देते हैं।

राहु देवता का रत्न गोमेद कभी भी किसी जातक को नहीं डाला जाता। क्यूंकि राहु देव के कारकत्व गलत हैं और गोमेद पहनने से वो हमारे शरीर में बढ़ जाते हैं राहु कुंडली में शुभ होने पर भी जातक को गोमेद धारण नहीं करना चाहिए।

इस कुंडली में राहु देवता पहले, दूसरे, पांचवें, नौवें, दसवें भाव में शुभ फल देते हैं क्योँकि यह उनकी मित्र राशि है।

तीसरे, चौथे, छठे, सातवें, आठवें, ग्यारहवें और बारहवें भाव में राहु अशुभ फल देते हैं क्योँकि यह उनकी शत्रु राशि है। सातवें और आठवें भाव में राहु देव नीच राशि में आ जाते हैं।

वृषभ लग्न में केतु ग्रह का फल

केतु देवता की भी अपनी कोई राशि नहीं होती है। अपनी मित्र राशि और शुभ भाव में ही वह शुभ होते हैं।

वृषभ लग्न कुंडली में केतु पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें भावों में शुभ फल देतें हैं क्योँकि यह उनकी मित्र राशि है।

पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे, छठे, आठवें, ग्यारहवें तथा बारहवें भावों में केतु मारक ग्रह बन जातें हैं अशुभ फल देते हैं क्योंकि पहले और दूसरे भावों में केतु देव नीच राशि में आ जाते हैं।

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वृषभ लग्न में धन योग

वृषभ लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के लिए धनप्रदाता ग्रह बुध है | धनेश बुध की शुभाशुभ स्थिति से एवं धन स्थान से संबंध जोड़ने वाले ग्रह की स्थिति से जातक की आर्थिक स्थिति, आय के स्रोत तथा चल-अचल संपत्ति का पता चलता है | लग्नेश शुक्र, भाग्येश शनि एवं लाभेश बृहस्पति की अनुकूल स्थितियां वृषभ लग्न वाले जातकों के लिए धन, ऐश्वर्य एवं वैभव को बढ़ाने में पूर्ण सहयोग करती हैं | इस लग्न की कुंडली के लिए शनि राजयोगकारी होता है | गुरु अष्टमेश होने के कारण मारक फल देता है | सूर्य शुभ फलदायक है, अतः योगकारक ग्रह सूर्य, बुध और शनि ही हैं |

शुभ युति : बुध + शनि

अशुभ युति : शुक्र + मंगल

राजयोग कारक : सूर्य, बुध, शनि

वृषभ लग्न की कुंडली में बुध मिथुन या कन्या राशि का हो तो व्यक्ति धनवान होता है |

वृषभ लग्न में शनि मकर, कुंभ या तुला राशि में हो तो जातक अल्प प्रयत्न से बहुत धन कमाता है | ऐसा व्यक्ति धन के मामले में भाग्यशाली होता है |

वृषभ लग्न में शुक्र लग्न में ही स्थित हो एवं शनि, बुध से दृष्ट हो तो जातक शहर का प्रतिष्ठित धनवान होता है |

वृषभ लग्न में बुध एवं शनि परस्पर राशि परिवर्तन योग कर के बैठे हो तो जातक अपने पुरुषार्थ एवं पराक्रम से धनवान बनता है |

वृषभ लग्न में बुध पंचम भाव में हो, मीन का बृहस्पति लाभ स्थान में चंद्रमा या मंगल के साथ हो तो महालक्ष्मी योग बनता है | ऐसे जातकों के पास अकूत संपत्ति होती है एवं जीवन भर इनके ऊपर भाग्यलक्ष्मी की कृपा होती है |

वृषभ लग्न में चंद्रमा लग्नगत हो साथ में मंगल हो तो जातक अपने पराक्रम से अतुल संपत्ति वान बनता है |

वृषभ लग्न में शनि केंद्र-त्रिकोण में हो, बुध धन भाव या पंचम भाव में स्वग्रही हो तो जातक कीचड़ में कमल की तरह खिलता है एवं करोड़पति बनता है |

वृषभ लग्न में शुक्र चंद्रमा और सूर्य की युति हो तो जातक महाधनी होता है |

वृषभ लग्न में शुक्र लाभ स्थान में तथा लाभेश गुरु लग्न स्थान में हो तो जातक अल्पायु में ही बहुत अधिक धन कमा लेता है | ऐसा जातक शत्रुओं का नाश करते हुए यशस्वी एवं जीवन भर धनलक्ष्मी को पाता है |

वृषभ लग्न में लग्नेश शुक्र धनेश बुध भाग्येश शनि एवं लाभेश गुरु अपनी अपनी उच्च या स्वराशि में स्थित हो तो जातक करोड़पति होता है |

वृषभ लग्न में पंचम भाव में राहु, शुक्र, मंगल और शनि इन चार ग्रहों की युति हो तो जातक अरबपति होता है |

वृषभ लग्न में बुध एवं शनि द्वितीय स्थान में हो तो जातक को धन की प्राप्ति होती है |

वृषभ लग्न में शुक्र मिथुन का हो, बुध मीन का हो, गुरु धनु का केंद्र में हो तो जातक यकायक अर्थ एवं धन की प्राप्ति करता है |

वृषभ लग्न में सूर्य वृश्चिक का हो तथा शुक्र सिंह का हो तो ऐसे जातक को ससुराल से धन प्राप्त होता है |

वृषभ लग्न में धनेश बुध यदि आठवें स्थान पर बैठा हो और सूर्य लग्न को देखता हो तो ऐसे जातक को भूमि में गड़े हुए धन की प्राप्ति होती है अथवा लाटरी से रुपया मिल सकता है |

वृषभ लग्न में धनेश बुध अष्टम में एवं अष्टमेश गुरु धन स्थान में परस्पर राशि परिवर्तन करके बैठे हो तो ऐसा जातक गलत तरीके जैसे- जुआ, सट्टा से धन कमाता है।

वृषभ लग्न में रत्न

रत्न कभी भी राशि के अनुसार नहीं पहनना चाहिए, रत्न कभी भी लग्न, दशा, महादशा के अनुसार ही पहनना चाहिए।

लग्न के अनुसार वृषभ लग्न मैं जातक हीरा, पन्ना, और नीलम रत्न धारण कर सकते है।

लग्न के अनुसार वृषभ लग्न मैं जातक को मोती, माणिक, मूंगा, और पुखराज रत्न कभी भी धारण नहीं करना चाहिए।

हीरा धारण करने से पहले – हीरे की अंगूठी या लॉकेट को दूध, शुद्ध जल या गंगा जल से धोकर पूजा करें और मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

  कौनसी उंगली में हीरा धारण करें – हीरे की अंगूठी को मघ्यमा या कनिष्का उंगली में धारण करना चाहिए।

  हीरा कब धारण करें – हीरा को शुक्रवार के दिन, शुक्र के होरे में, शुक्रपुष्य नक्षत्र में, या शुक्र के नक्षत्र भरणी नक्षत्र, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में धारण कर सकते है।

  कौनसे धातु में हीरा धारण करें – चांदी, प्लैटिनम या सोने मे हीरा रत्न धारण कर सकते है।

  हीरा धारण करने का मंत्र – ॐ शुं शुक्राय नम:। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

  ध्यान रखे हीरा धारण करते समय राहुकाल ना हो।

  पन्ना धारण करने से पहले – पन्ने की अंगूठी या लॉकेट को शुद्ध जल या गंगा जल से धोकर पूजा करें और मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

  कौनसी उंगली में पन्ना धारण करें – पन्ने की अंगूठी को कनिष्का उंगली में धारण करना चाहिए।

  पन्ना कब धारण करें – पन्ने को बुधवार के दिन, बुध के होरे में, बुधपुष्य नक्षत्र को, या बुध के नक्षत्र अश्लेषा नक्षत्र, ज्येष्ठ नक्षत्र, और रेवती नक्षत्र में धारण कर सकते है।

  कौनसे धातु में पन्ना धारण करें – सोना में या पंचधातु में पन्नाधारण कर सकते है।

  पन्ना धारण करने का मंत्र – ॐ बुं बुधाय नमः। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

  ध्यान रखे पन्ना धारण करते समय राहुकाल ना हो।

  नीलम धारण करने से पहले – नीलम की अंगूठी या लॉकेट को शुद्ध जल या गंगा जल से धोकर करें एवं पूजा करें और मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

  कौनसी उंगली में नीलम धारण करें – नीलम की अंगूठी को मघ्यमा उंगली में धारण करना चाहिए।

  नीलम कब धारण करें – शनिवार के दिन, शनिपुष्य नक्षत्र को, शनि के होरे में, या शनि के नक्षत्र पुष्य नक्षत्र,अनुराधा नक्षत्र, और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में नीलम धारण कर सकते है।

  कौनसे धातु में नीलम धारण करें – चांदी, लोहे, प्लैटिनम या सोने में नीलम धारण कर सकते है।

  नीलम धारण करने का मंत्र – ॐ शं शनिश्चराय नम:। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

  ध्यान रखे नीलम धारण करते समय राहुकाल ना हो।

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