कर्क लग्न की संपूर्ण जानकारी

कर्क लग्न की संपूर्ण जानकारी

कर्क लग्न वाले जातक के गुण

कर्क लग्न जिसका स्वामी चन्द्रमा है, एक जलीय, चलायमान या अस्थिर राशि है। विशेषत: यह स्त्री-प्रवृति, लाभदायक तथा भावुक राशि है। इस लग्न में जन्मे जातक प्रेम-विलासी और कल्पनाशील होते हैं। कर्क लग्न के जातक अत्यधिक भावुक परन्तु न्यायप्रिय होते हैं। दूसरों के प्रति दया व प्रेम की भावना तथा जीवन में निरंतर आगे बढ़ने की तीव्र लालसा इनकी निजी विशेषता होती है। इनकी मानसिक शक्ति बड़ी तीव्र एवं मजबूत होती है। यह सत्यवादी तथा शुद्ध हृदय वाले होते हैं।

इस लग्न में जन्मे व्यक्ति गौर वर्ण तथा कोमल शारीरिक गठन के होते हैं। ये जातक विलासी, गतिशील, परिवर्तनशील एवं चंचल प्रवृत्ति वाले होते हैं। यह लचीले स्वभाव के व्यक्ति होते हैं इसलिए हर तरह की परिस्थिति में स्वयं को ढालने में सक्षम भी होते हैं। इनका कोई भी कार्य धन के आभाव में नहीं रुकता। सामाजिक कार्यों में भी धन व्यय करने हेतु सदैव अग्रणी एवं तत्पर रहते हैं। कर्क लग्न में जन्म लेने वाले जातक प्रायः राजनेता, मंत्री, राज्याधिकारी, डाक्टर, व्यवसायी, नाविक, प्राध्यापक अथवा इतिहासकार आदि क्षेत्रों को अपनी जीविकोपार्जन का माध्यम बनाते हैं।

इस लग्न वाले जातक दूसरों की राय को ज्यादा महत्व देते हैं और इसी कारण यह गुण से इनकी समाज में मान प्रतिष्ठा बढती है। लोग इनका सम्मान करते हैं और इनको अपना समझते हैं। ऐसे जातक अपने जीवन में उतार-चढ़ाव का बहादुरी से सामना करते हैं। इन्हें अपने परिवार के सदस्यों से काफी लगाव होता है और अपने घर में सुख-शान्ति बनाये रखने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। यह जीवन में भौतिक सुख संसाधनों को ये स्वपरिश्रम तथा पराक्रम से अर्जित करते हैं तथा सुखपूर्वक इनका भोग भी करते हैं। ऐसे जातक यथार्थ से परे रह कर कल्पनाओं के संसार में ज्यादा विचरण करते हैं, जिस वजह से यह काल्पनिक समस्याओं एवं डर से पीडित होते हैं।

कर्क लग्न में ग्रहों के प्रभाव :

कर्क लग्न में चंद्र ग्रह का प्रभाव

कर्क लग्न में चंद्र देवता पहले घर के स्वामी हैं। पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, नवम, दसम और ग्यारहवें भाव में अपनी क्षमता के मुताबिक शुभ फल देंगे। तीसरा, पांचवा (नीच), छठा, आठवें और बारहवें भाव में यदि चंद्र देवता उदय अवस्था में पड़े हैं तो अशुभ फल देंगे। उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता दूर की जाती है। अस्त अवस्था में चन्द्रमा किसी भाव में पड़े हो तो इनके रत्न मोती को धारण करना चाहिए।

कर्क लग्न में सूर्य ग्रह का प्रभाव

सूर्य देवता इस लग्न कुंडली में दूसरे भाव के स्वामी हैं। द्वितीय भाव मारक भाव कहलाता है, इसलिए सूर्य देव कर्क लग्न में मारक ग्रह होते हैं। इस लग्न कुंडली में जब भी सूर्य की महादशा चलती है तो चाहे वो धन का थोड़ा आगमन करवाती है लेकिन कुल मिलाकर वह अशुभता का ही फल देती है। इस लग्न कुंडली में इसका रत्न कभी भी धारण नहीं किया जा सकता है। इसका दान-पाठ करके इसकी अशुभता को कम किया जा सकता है।

कर्क लग्न में बुध ग्रह का प्रभाव

बुध देवता इस लग्न कुंडली में तीसरे और द्वादश भाव के स्वामी हैं। दोनों ख़राब भावों के स्वामी और लग्नेश चन्द्रमा के अति शत्रु हैं इस वजह से यह इस लग्न कुंडली में एक मारक ग्रह बन जाते हैं। इस लग्न कुंडली में बुध की महादशा व अंतर्दशा हर भाव में अशुभ फल देगी। इस ग्रह की अशुभता इनके दान-पाठ करके कम की जा सकती है। अगर बुध देवता छठें, आठवें या बारहवें भाव में विराजमान हो और चन्द्रमा कही बली हो तो बुध देवता विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल दायक भी हो सकतें है। इस लग्न कुंडली में बुध का रत्न पन्ना किसी भी जातक को कभी भी धारण नहीं करने चाहिए।

कर्क लग्न में शुक्र ग्रह का प्रभाव

इस लग्न कुंडली में शुक्र देवता चौथे और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। शुक्र इस लग्न कुंडली में सम ग्रह माने जातें है क्योँकि यह दो अच्छे घरों के मालिक हैं। अगर शुक्र देवता लग्न, दूसरा, चौथा, पांचवा, सातवा, नवम ( उच्च ), दसम और ग्यारहवें भाव में विराजमान हो तो अपनी क्षमतानुसार अच्छा फल देते हैं। तीसरा (नीच ), छठा, आठवां, बारहवें भाव में यह अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं। अगर अच्छे भाव में शुक्र देवता पड़े हो तो अपनी दशा-अंतर्दशा में उसका नग पहनकर उसकी शुभता को बढ़ाया जाता है। अगर शुक्र देव अशुभ भावों में पड़े हो तो इस ग्रह की अशुभता इनके दान पाठ करके कम की जा सकती है।

कर्क लग्न में मंगल ग्रह का प्रभाव

इस लग्न कुंडली में मंगल देवता पांचवें और दसवें भाव के स्वामी हैं और लग्नेश चन्द्रमा के अति मित्र हैं इसलिए इस लग्न कुंडली के अति योग कारक हैं। अगर मंगल देवता दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें (उच्च ), नवम, दसम, ग्यारहवें भाव में विराजमान हो तो अपनी क्षमतानुसार सदा शुभफल देते हैं। लग्न (नीच), तीसरा, छठा, आठवाँ, बारहवें भाव में अगर मंगल देव विराजमान हों तो अपनी क्षमता के अनुसार सदा अशुभ फल देते हैं। इस ग्रह की अशुभता इनके दान पाठ करके कम की जा सकती है। अगर अच्छे भाव में मंगल देवता विराजमान हो तो इसका नग मूंगा पहनकर इसकी शुभता को बढ़ाया जा सकता है।

कर्क लग्न में शनि ग्रह का प्रभाव

इस लग्न कुंडली में शनि देवता सातवें और आठवें भाव के मालिक हैं। लग्नेश चन्द्रमा के शत्रु एवं अष्टमेश होने के कारण वह कुंडली के अतिमारक ग्रह माने जाते हैं। कुंडली में किसी भी भाव में पड़े शनि देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं। परन्तु यदि शनि देवता छठे, आठवें और बारहवें भाव में पड़े हो तो विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता भी रखते हैं। पर इसके लिए लग्नेश चन्द्रमा का बलि होना और शुभ होना अनिवार्य है। इस लग्न कुंडली में शनि का रत्न नीलम कदापि और किसी भी जातक को नहीं पहनना चाहिए, अपितु उनका दान व पाठ कर के शनि की अशुभता दूर की जाती है।

कर्क लग्न में बृहस्पति ग्रह का प्रभाव

इस लग्न कुंडली में बृहस्पति देवता छठे और नवम भाव के स्वामी हैं एवं लग्नेश चन्द्रमा के अति मित्र भी हैं। इन्ही कारणों से बृहस्पति देवता इस कुंडली में अति योगकारक ग्रह होते हैं। पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, नौवें, दसवें और एकादश भाव में बृहसपति देवता अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं। कुंडली के किसी भी भाव में यदि गुरु देवता सूर्य के साथ बैठकर अस्त हो जाते हैं तो उनका रत्न पुखराज पहन कर उनका बल बढ़ाया जाता है।

कर्क लग्न में राहु ग्रह का प्रभाव

राहु को कर्क लग्न में तॄतीयेश का दायित्व मिलता है जिस नाते यह कर्क लग्न के जातकों के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है। जन्‍मकुंडली या दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं।

कर्क लग्न में केतु ग्रह का प्रभाव

केतु को कर्क लग्न में नवमेष होने का दायित्व मिला हुआ है जिस कारण यह कर्क लग्न के जातकों के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है। जन्‍मकुंडली या दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं।

कर्क लग्न में ग्रहों की स्तिथि

कर्क लग्न में योग कारक ग्रह (शुभ/मित्र ग्रह)

चन्द्रमा 1, भाव का स्वामी

मंगल देव 5, 10, भाव का स्वामी

बृहस्पति 6, भाव 9, भाव का स्वामी

कर्क लग्न में मारक ग्रह (शत्रु ग्रह)

सूर्य 2, भाव का स्वामी

बुध देव 3, 12, भाव का स्वामी

शनि देव 7, 8, भाव का स्वामी

कर्क लग्न में सम ग्रह

शुक्र देव 4, 11, भाव का स्वामी

कर्क लग्न में ग्रहों का फल

कर्क लग्न में चन्द्र ग्रह का फल

कर्क लग्न में चंद्र देवता पहले घर के स्वामी हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, नवम, दसम और ग्यारहवें भाव में अपनी क्षमता के मुताबिक शुभ फल देंगे।

तीसरा, पांचवा (नीच), छठा, आठवें और बारहवें भाव में यदि चंद्र देवता उदय अवस्था में पड़े हैं तो अशुभ फल देंगे। उनका दान और पाठ करके उनकी अशुभता दूर की जाती है।

अस्त अवस्था में चन्द्रमा किसी भाव में पड़े हो तो इसके रत्न धारण करना चाहिए।

अगर चन्द्रमा उदय अवस्था में तीसरे, पांचवें (नीच ), छठें, आठवें और बारहवें भाव में पड़े हो तो इनका रत्न धारण नहीं करना चाहिए।

कर्क लग्न में सूर्य ग्रह का फल

सूर्य देवता इस लग्न कुंडली में दूसरे भाव के स्वामी हैं। चाहे वो लग्नेश के मित्र हैं लेकिन उनका तत्व लग्नेश के तत्व से बिलकुल विपरीत है। इसलिए सूर्य देव कर्क लग्न में मारक ग्रह होते हैं।

इस लग्न कुंडली में जब भी सूर्य की महादशा चलती है तो चाहे वो धन का थोड़ा आगमन करवाती है लेकिन कुल मिलाकर वह अशुभता का ही फल देती है।

इस लग्न कुंडली में इसका रत्न कभी भी धारण नहीं किया जा सकता है।

इसका दान – पाठ करके इसकी अशुभता को कम किया जा सकता है।

कर्क लग्न में बुध ग्रह का फल

बुध देवता इस लग्न कुंडली में तीसरे और द्वादश भाव के स्वामी हैं। दोनों ख़राब भावों के स्वामी और लग्नेश चन्द्रमा के अति शत्रु हैं इस वजह से यह इस लग्न कुंडली में एक मारक ग्रह बन जातें है

इस लग्न कुंडली में बुध की अंतर्दशा हर भाव में अशुभ फल देगी। इस ग्रह की अशुभता इनके दान – पाठ करके कम की जा सकती है।

3 अगर बुध देवता छठें, आठवें या बारहवें भाव में विराजमान हो और चन्द्रमा कही बलि हो तो बुध देवता विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल दायक भी हो सकतें है।

इस लग्न कुंडली में बुध का रत्न पन्ना किसी भी जातक को कभी भी धारण नहीं करने चाहिए।

कर्क लग्न में शुक्र ग्रह का फल

इस लग्न कुंडली में शुक्र देवता चौथे और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। यह इस लग्न कुंडली में सम ग्रह माने जातें है क्योँकि यह दो अच्छे घरों के मालिक हैं और लग्नेश चन्द्रमा के विरोधी दल के हैं।

अगर शुक्र देवता लग्न, दूसरा, चौथा, पांचवा, सातवा, नवम ( उच्च ), दसम और ग्यारहवें भाव में विराजमान हो तो अपनी क्षमतानुसार अच्छा फल देते हैं।

तीसरा (नीच ), छठा, आठवां, बारहवें भाव में यह अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं।

अगर अच्छे भाव में शुक्र देवता पड़े हो तो अपनी दशा अंतर दशा में उसका नग पहनकर उसकी शुभता को बढ़ाया जाता है।

अगर शुक्र देव अशुभ भावों में पड़े हो तो इस ग्रह की अशुभता इनके दान पाठ करके कम की जा सकती है।

कर्क लग्न में मंगल ग्रह का फल

इस लग्न कुंडली में मंगल देवता पांचवें और दसवें भाव के स्वामी हैं और लग्नेश चन्द्रमा के अति मित्र हैं इसलिए इस लग्न कुंडली के अति योग कारक हैं।

अगर मंगल देवता दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें (उच्च ), नवम, दसम, ग्यारहवें भाव में विराजमान हो तो अपनी क्षमतानुसार सदा शुभ फल देते हैं।

लग्न (नीच), तीसरा, छठा, आठवाँ, बारहवें भाव में अगर मंगल देव विराजमान हों तो अपनी क्षमता के अनुसार सदा अशुभ फल देते हैं। इस ग्रह की अशुभता इनके दान पाठ करके कम की जा सकती है।

अगर अच्छे भाव में मंगल देवता विराजमान हो तो इसका नग मूंगा पहनकर इसकी शुभता को बढ़ाया जा सकता है।

अगर मंगल देवता कुंडली में कही भी अस्त हो इसका नग पहन कर उसकी क्षमता को बढ़ाना चाहिए।

कर्क लग्न में शनि ग्रह का फल

इस लग्न कुंडली में शनि देवता सातवें और आठवें भाव के मालिक हैं। लग्नेश चन्द्रमा के शत्रु होने के कारण वह कुंडली के अति मारक ग्रह माने जाते हैं।

कुंडली में किसी भी भाव में पड़े शनि देवता अपनी दशा अन्तरा में अपनी क्षमतानुसार अशुभ फल देते हैं।

परन्तु यदि शनि देवता छठे, आठवें और बारहवें भाव में पड़े हो तो विपरीत राजयोग में आकर शुभ फल देने की क्षमता भी रखते हैं। पर इसके लिए लग्नेश चन्द्रमा का बलि होना और शुभ होना अनिवार्य है।

इस लग्न कुंडली में शनि का रत्न नीलम कदापि और किसी भी जातक को नहीं पहनना चाहिए, अपितु उनका दान व पाठ कर के शनि की अशुभता दूर की जाती है।

कर्क लग्न में बृहस्पति ग्रह का फल

इस लग्न कुंडली में बृहस्पति देवता छठे और नवम भाव के स्वामी हैं। उसकी साधारण राशि (मीन) कुंडली के त्रिकोण भाव में है ल वह लग्नेश चन्द्रमा के अति मित्र भी हैं। इन्ही कारणों से बृहस्पति देवता इस कुंडली में अति योग कारक ग्रह बने हैं।

पहले, दूसरे, चौथे, पांचवें, नौवें, दसवें और एकादश भाव में बृहसपति देवता अपनी दशा – अन्तरा में अपनी क्षमता अनुसार शुभ फल देते हैं।

कुंडली के किसी भी भाव में यदि गुरु देवता सूर्य के साथ बैठकर अस्त हो जाते हैं तो उनका रत्न पुखराज पहन कर उनका बल बढ़ाया जाता है।

तीसरे, छठे, सातवें (नीच), आठवें और द्वादश भाव में उदय अवस्था में पड़े बृहस्पति देवता अशुभ देते हैं। परन्तु छठे, आठवें और द्वादश भाव में बृहसपति देवता विपरीत राजयोग मे आकर शुभ फल देते हैं। परन्तु उसके लिए लग्नेश चन्द्रमा का बलि और शुभ होना अति अनिवार्य है।

बृहस्पति देवता का बल उनका रत्न पुखराज पहन कर बढ़ाया जाता है और अशुभता दान – पाठ करके दूर की जाती है।

कर्क लग्न में राहु ग्रह का फल

राहु देवता की कोई अपनी राशि नहीं होती है। राहु देवता अपने मित्र की राशि में शुभ भाव में बैठकर ही शुभ फल देते हैं।

इस लग्न कुंडली में राहु देवता चौथे, सातवें और एकादश भाव में शुभ फल देते हैं।

पहले, दूसरे, तीसरे, पांचवें, छठें, आठवें, नवम, दसम, और बारहवें भाव में राहु देवता अशुभ हो जातें है।

राहु देवता का रत्न गोमेद कभी भी किसी जातक को नहीं पहनना चाहिए। अपितु उनके दान -पाठ करके उनकी अशुभता को कम करनी चाहिए।

कर्क लग्न में केतु ग्रह का फल

केतु देवता की अपनी कोई राशि नहीं होती है। केतु देवता अपने मित्र की राशि में और शुभ भाव में ही बैठकर शुभ फलदायक होते हैं।

केतु देवता इस लग्न कुंडली में चौथे, पांचवें (उच्च ) और सातवें भाव में शुभ फल देतें है।

पहले दूसरे, तीसरे, छठें, आठवें, नवम, दशम, एकादश ( नीच ) और द्वादश भाव में केतु देवता मारक ग्रह बन जातें है।

केतु देवता का रत्न लहसुनिया कभी भी नहीं पहना जाता है अपितु उनके दान पाठ करके अशुभता को दूर की जाती है।

कर्क लग्न में धनयोग

कर्क लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के लिए धनप्रदाता ग्रह सूर्य है। धनेश सूर्य की शुभाशुभ स्थिति से, धन स्थान से संबंध जोड़ने वाले ग्रह की स्थिति से एवं धन स्थान पर पड़ने वाले ग्रहों की दृष्टि संबंध से जातक की आर्थिक स्थिति, आय के स्रोत तथा चल-अचल संपत्ति का पता चलता है। लग्नेश चंद्र, पंचमेश एवं दशमेश मंगल, भाग्येश बृहस्पति की अनुकूल स्थितियां कर्क लग्न वालों के लिए धन एवं वैभव को बनाने में सहयोग करती हैं। वैसे कर्क लग्न के लिए शुक्र, शनि एवं बुध परमपापी, गुरु और सूर्य शुभ हैं। इस लग्न में मंगल अकेला राजयोग कारक है।

शुभ युति :- चन्द्र + मंगल

अशुभ युति :- मंगल + शुक्र

राजयोग कारक :- केवल मंगल

कर्क लग्न में सूर्य सिंह या मेष राशि में हो तो जातक बहुत धनवान बनता है। धन के मामले में भाग्य-लक्ष्मी हमेशा उसका पीछा नहीं छोड़ती।

कर्क लग्न में धनेश सूर्य मीन राशि में तथा बृहस्पति सिंह राशि में परस्पर राशि परिवर्तन करके बैठे हों, तो जातक भाग्यशाली एवं लक्ष्मीवान होता है।

कर्क लग्न में सूर्य, शुक्र के घर में तथा शुक्र, सूर्य के घर में परस्पर परिवर्तन करके बैठे हो तो जातक महाभाग्यशाली एवं अत्यधिक धन-अर्जित करने वाला होता है।

कर्क लग्न में मंगल केंद्र या त्रिकोण में कहीं भी चंद्रमा के साथ हो तो जातक कीचड़ में कमल की तरह खिलता हुआ सामान्य परिवार में जन्म लेकर भी करोड़पति बनता है।

कर्क लग्न में चंद्रमा, गुरु एवं मंगल के साथ हो या दृष्ट हो तो जातक महाधनी होता है तथा व्यक्ति धनशाली व्यक्तियों में अग्रगण्य होता है।

कर्क लग्न में स्वगृही मंगल पंचम भाव में हो तथा लाभ स्थान में स्वगृही शुक्र हो तो जातक महालक्ष्मीवान होता है।

कर्क लग्न में चंद्रमा यदि वृष राशि में हो तथा शुक्र कर्क राशि में हो तो जातक शत्रुओं का नाश करते हुए स्वअर्जित धन-लक्ष्मी को भोगता है।

कर्क लग्न में लग्नेश चंद्रमा धनेश्वर भाग्य सरस्वती एवं मिलावे शुक्र अपनी-अपनी उच्च या स्वराशि में स्थित हो तो जातक करोड़पति होता है।

कर्क लग्न में धनेश सूर्य यदि आठवें हो तो एवं लग्नेश चंद्रमा उसे देखते हो, तो जातक को गड़े हुए धन की प्राप्ति होती है या लाटरी से रुपया मिल सकता है।

कर्क लग्न में चंद्रमा, मंगल व गुरु दूसरे भाव में हो तथा शुक्र, सूर्य वृश्चिक राशि में हो, तो जातक भिक्षुक के घर में जन्म लेकर भी करोड़पति बनता है।

कर्क लग्न में बुध, शुक्र के साथ पंचम भाव में हो तो बुध अपनी दशा अंतर्दशा में धन व अर्थ की प्राप्ति करवाता है।

बुध शुक्र बारहवें भाव में हो तो शुक्र की दशा में जातक ख्याति, यश एवं धन लाभ प्राप्त करता है।

सूर्य, शुक्र छठवें स्थान में हो गुरु मिथुन राशि का हो तथा चंद्रमा तृतीय भाव में हो तो जातक करोड़पति होता है।

कर्क लग्न में सुखेश शुक्र नवं भाव में हो एवं मंगल से दृष्ट हो तो जातक को अनायास धन की प्राप्ति होती है।

कर्क लग्न में धनेश सूर्य अष्टम में तथा अष्टमेश शनि धनस्थान में परस्पर परिवर्तन करके बैठे हों, तो ऐसा जातक गलत तरीके से धन कमाता है।

कर्क लग्न में रत्न

रत्न कभी भी राशि के अनुसार नहीं पहनना चाहिए, रत्न कभी भी लग्न, दशा, महादशा के अनुसार ही पहनना चाहिए।

लग्न के अनुसार कर्क लग्न मैं जातक मोती, माणिक, मूंगा और पुखराज रत्न धारण कर सकते है।

लग्न के अनुसार कर्क लग्न मैं जातक को पन्ना, हीरा, और नीलम रत्न कभी भी धारण नहीं करना चाहिए।

कर्क लग्न में मोती रत्न

·  मोती धारण करने से पहले – मोती की अंगूठी या लॉकेट को शुद्ध जल या गंगा जल से धोकर पूजा करें और मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

·  कौनसी उंगली में मोती धारण करें – मोती की अंगूठी को कनिष्का उंगली में धारण करना चाहिए।

·  मोती कब धारण करें – मोती को सोमवार के दिन, चंद्र के होरे में, चंद्रपुष्य नक्षत्र में, या चंद्र के नक्षत्र रोहिणी नक्षत्र, हस्त नक्षत्र, श्रवण नक्षत्र में धारण कर सकते है।

·  कौनसे धातु में मोती धारण करें – चांदी में मोती रत्न धारण कर सकते है।

·  मोती धारण करने का मंत्र – ॐ चं चन्द्राय नमः। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

·  ध्यान रखे मोती धारण करते समय राहुकाल ना हो।

कर्क लग्न में माणिक रत्न

·  माणिक धारण करने से पहले – माणिक की अंगूठी या लॉकेट को शुद्ध जल या गंगा जल से धोकर पूजा करें और मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

·  कौनसी उंगली में माणिक धारण करें – माणिक की अंगूठी को अनामिका उंगली में धारण करना चाहिए।

·  माणिक कब धारण करें – माणिक को रविवार के दिन, रवि के होरे में, पुष्यनक्षत्र को, या सूर्य के नक्षत्र मघा नक्षत्र, पूर्वा फ़ाल्गुनी नक्षत्र, उत्तरा फ़ाल्गुनी नक्षत्र, पुष्यनक्षत्र को में धारण कर सकते है।

·  कौनसे धातु में माणिक धारण करें – तांबे, पंचधातु या सोने में माणिक धारण कर सकते है।

·  माणिक धारण करने का मंत्र – ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

·  ध्यान रखे माणिक धारण करते समय राहुकाल ना हो।

कर्क लग्न में मूंगा रत्न

·  मूंगा धारण करने से पहले – मूंगे की अंगूठी या लॉकेट को गंगाजल से अथवा शुद्ध जल से स्नान कराकर मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

·  कौनसी उंगली में मूंगा धारण करें – मूंगे की अंगूठी को अनामिका उंगली में धारण करना चाहिए।

·  मूंगा कब धारण करें – मूंगा को मंगलवार के दिन, मंगल के होरे में, मंगलपुष्य नक्षत्र को या मंगल के नक्षत्र मृगशिरा नक्षत्र, चित्रा नक्षत्र या धनिष्ठा नक्षत्र में धारण कर सकते है।

·  कौनसे धातु में मूंगा धारण करें – मूंगा रत्न तांबा, पंचधातु या सोने मे धारण कर सकते है।

·  मूंगा धारण करने का मंत्र – ॐ भौं भौमाय नमः। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

·  ध्यान रखे मूंगा धारण करते समय राहुकाल ना हो।

कर्क लग्न में पुखराज रत्न

·  पुखराज धारण करने से पहले – पुखराज की अंगूठी या लॉकेट को शुद्ध जल या गंगा जल से धोकर पूजा करें और मंत्र का जाप करके धारण करना चाहिए।

·  कौनसी उंगली में पुखराज धारण करें – पुखराज की अंगूठी को तर्जनी उंगली में धारण करना चाहिए।

·  पुखराज कब धारण करें – पुखराज को गुरुवार के दिन, गुरु के होरे में, गुरुपुष्य नक्षत्र को, या गुरु के नक्षत्र पुनर्वसु नक्षत्र, विशाखा नक्षत्र, पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में धारण कर सकते है।

·  कौनसे धातु में पुखराज धारण करें – सोने में या पंचधातु में पुखराज रत्न धारण कर सकते है।

·  पुखराज धारण करने का मंत्र – ॐ बृ बृहस्पतये नम:। इस मंत्र का जाप 108 बार करना चाहिए।

·  ध्यान रखे पुखराज धारण करते समय राहुकाल ना हो।

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