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ग्रह दशाओं का प्रभाव -

ग्रह दशाओं का प्रभाव

धन कमाने या संग्रह करने में जातक की कुंडली में दशा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। द्वितीय भाव के अधिपति यानी द्वितीयेश की दशा आने पर जातक को अपने परिवार से संपत्ति प्राप्त होती है , पांचवें भाव के अधिपति यानी पंचमेश की दशा में सट्टे या लॉटरी से धन आने के योग बनते हैं। आमतौर पर देखा गया है कि यह दशा बीतने के साथ ही जातक का धन भी समाप्त हो जाता है। ग्यारहवें भाव के अधिपति यानी एकादशेश की दशा शुरू होने के साथ ही जातक की कमाई के कई जरिए खुलते हैं। ग्रह और भाव की स्थिति के अनुरूप फलों में कमी या बढ़ोतरी होती है। छठे भाव की दशा में लोन मिलना और बारहवें भाव की दशा में खर्चों में बढ़ोतरी के संकेत मिलते हैं।

2. लग्न आपका अपना शरीर है और सातवाँ घर आपके पति या पत्नी का परिचायक है | यदि खूबसूरती का प्रश्न हो तो सब जानते हैं कि राहू और शनि खूबसूरती में दोष उत्पन्न करते हैं | गुरु मोटापा बढाता है | शुक्र के कमजोर होने से शरीर में खूबसूरती और आकर्षण का अभाव रहता है | मंगल शरीर के किसी अंग में कमी ला सकता है और राहू सच को छिपा कर आपको वो दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं

इसी कारण ऐसा होता है और यदि आपको ये वहम हो जाए कि आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है या हो सकता है तो आपके विचार और प्रश्न आमंत्रित हैं |

3. षष्ठेश , अष्टमेश उआ द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है। काम प्रकृति की विभिन्नता के कारण असफल यौन संबंध जीवन में विषमता का कारण बन सकते हैं। इन सभी तत्वों का तात्पर्य यह है कि कुण्डली मिलान या गुण मिलान से अधिक महत्वपूर्ण है वर एवं कन्या के ग्रहों की प्रवृति का विश्लेषण करना। दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है। एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नहीं तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता।

4. राहु वास्तव में छाया ग्रह है,यह अपने ऊपर कोई आक्षेप नही लेता है,यह एक बिन्दु की तरह से है जो जीव के उसी के रूप में आगे पीछे चलता है,कभी जीव का साथ नही छोडता है,इसके अन्दर एक अजीब सी शक्ति होती है,जब जीव का दिमाग इसके अन्दर फ़ंस जाता है तो वह जीव के साथ जो नही होना होता है वह करवा देता है। यह तीन मिनट की गति से कुंडली में प्रतिदिन की औसत चाल चलता है,इसका भरोसा नही होता है,कि सुबह यह क्या कर रहा है दोपहर को क्या करेगा और शाम होते ही यह क्या दिखाना शुरु कर देगा। राहु को ही कालपुरुष की संज्ञा दी गयी है,वह विराट रूप में सभी के सामने है उसकी सीमा अनन्त है,उसकी दूरी को कोई नाप नही सका है,केवल उसकी संज्ञा नीले रंग के रूप में अनन्त आकाश की ऊंचाइयों में देखी जा सकती है,यह केतु से हमशा विरोध में रहता है,और उसकी उल्टी दिशा का बोधक होता है,जो केतु सहायता के रूप में सामने आता है यह उसी का बल हरण करने के बाद उसकी शक्ति और बोध दोनो को बेकार करने के लिये अपनी योग्यता का प्रमाण देने से नही चूकता है। सूर्य के साथ अपनी युति बनाते ही वह पिता या पुत्र को आलसी बना देता है,जो कार्य जीवन के प्रति उन्नति देने वाले होते है वे आलस की बजह से पूरे नही हो पाते है,वह आंखो को भ्रम में डाल देता है होता कुछ है और वह दिखाना कुछ शुरु कर देता है। जातक के साथ जो भी कार्य चल रहा होता है उसके अन्दर असावधानी पैदा करने के बाद उस कार्य को बेकार करने के लिये अपनी शक्ति को देता है,पलक झपकते ही आंख की किरकिरी बनकर सडक में मिला देता है,सूर्य के साथ जब भी मिलता है तो केवल जो भी सुनने को मिलता है वह अशुभ ही सुनने को मिलता है,जातक के स्वास्थ्य में खराबी पैदा करने के लिये राहु और सूर्य की युति मुख्य मानी जाती है। राहु से अष्टम में जब भी सूर्य का आना होता है तो या तो बुखार परेशान करता है,अथवा किसी सूर्य से सम्बन्धित कारक का खात्मा सुनने को मिलता है।

5. गुरु और राहु दोनो मिलकर जहरीली गैस जैसा उपाय करते है,घर परिवार समाज वातावरण भोजन पानी आदि जीवन के सभी कारक इतना गलत प्रभाव देना चालू कर देते है कि व्यक्ति का जीवन दूभर हो जाता है,अगर व्यक्ति घर वालों के द्वारा परेशान किया जा रहा है तो पडौस के लोग भी उसे परेशान कर देते है,वह पडौस से भी दूर जाना चाहता है तो उसे कालोनी या गांव के लोग परेशान करना चालू कर देते है,जब कि उसकी कोई गल्ती नही होती है केवल वह अपने अन्दर के हाव भाव इस तरह से प्रदर्शित करने लगता है जैसे कि उसके पास कोई बहुत बडी आफ़त आने वाली हो और वह हर बात में डर रहा हो। राहु जो विराट है वह जीव को अपने में समालेने के लिये आसपास अपना माहौल फ़ैला लेता है,और जीव किसी भी तरह से उसके चंगुल में आ ही जाता है,बहुत ही भाग्य या पौरुषता होती है तो जीव बच पाता है,अन्यथा वह राहु का ग्रास तो बन ही जाता है।

6. अक्सर देखने में आता है कि ज्यादातर लोग जिनके पास कुंडली का अभाव हो वे हस्त रेखा द्वारा अपना भाग्य आज़माने मे अग्रसर होते हैं। याद रखें कुंडली हाथ में नही होती। हाथ में सिर्फ कर्म होता है। हस्त रेखाएं दशा दिशा और कर्म के मुताबिक हमेशा बदलती रहती हैं। इन पर भरोसा ना करें व सटीक जानकारी के लिए कुंडली को ही प्राथमिकता दें। जिनके पास अपनी बर्थ डिटेल्स ना हों वे प्रश्न कुंडली से भी सहायता ले सकते हैं।

नोट:- हर जातक जातिका की कुंडली में ग्रहों की स्तिथि अलग अलग होती है इसलिए हर जातक किसी भी ग्रह की वजह से शुभ या अशुभ समय से गुजर रहा है तो उनके परडिक्षन या उपाय भी उनकी वर्तमान समस्या तथा कुंडली मे स्थित ग्रहों की स्तिथि के अनुसार ही किये जाये तो बेहतर परिणाम मिल पाते हैं। यही कारण है कि दुसरो की देखा देखी किये जाने वाले उपाय लाभ कि बजाय हानि ज्यादा करते हैं। हमेशा अपनी कुंडली के अनुसार ही उपाय या रत्न धारण किया करें।

ॐ रां रामाय नम:  श्रीराम ज्योतिष सदन, पंडित आशु बहुगुणा, संपर्क सूत्र- 9760924411

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